Right to Information Act,2005


सूचना का अधिकार (RTI): हमारा पैसा, हमारा हिसाब

​नमस्कार साथियों! आज मैं आपके साथ एक ऐसे 'हथियार' के बारे में बात करने जा रहा हूँ जो हम आम नागरिकों के लिए सबसे ताकतवर है— आरटीआई (RTI) यानी सूचना का अधिकार।

​कई बार हम देखते हैं कि हमारे आसपास कोई सरकारी काम चल रहा है, लेकिन हमें पता ही नहीं होता कि उसका बजट कितना है या वह कब तक पूरा होगा। मन में सवाल तो बहुत आते हैं, पर हम सोचते हैं कि सरकारी दफ्तरों में जाकर कौन पूछेगा, और क्या वो हमें सही जानकारी देंगे?

​आरटीआई क्या है?

सीधे और आसान शब्दों में कहूँ तो, यह हमारा कानूनी हक है कि हम सरकार से उनके काम का हिसाब मांग सकें। एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं— मान लीजिए हमारे इलाके में जल जीवन मिशन के तहत पानी की टंकी बन रही है, और हमें जानना है कि उसका कुल बजट कितना है या विभाग ने उसे कब तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है? ऐसे में हम सिर्फ अंदाजा लगाने के बजाय सीधे संबंधित विभाग के अधिशासी अभियंता (Executive Engineer) या जन सूचना अधिकारी से सवाल पूछ सकते हैं। यही आरटीआई है। सरकार और सरकारी विभाग हमारे टैक्स के पैसे से चलते हैं, इसलिए हमें यह जानने का पूरा अधिकार है कि हमारा पैसा कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है।

​आरटीआई क्यों ज़रूरी है?

यह व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर सरकारी अधिकारियों को पता होगा कि जनता कभी भी किसी भी काम का पूरा ब्यौरा मांग सकती है, तो वो अपना काम ज़्यादा ईमानदारी और जिम्मेदारी से करेंगे। यह हमें एक मूकदर्शक से एक जागरूक नागरिक बनाता है।

​थोड़ा सा इतिहास भी जान लेते हैं

यह अधिकार हमें आसानी से रातों-रात नहीं मिल गया। इसके पीछे आम लोगों का एक लंबा संघर्ष रहा है। 1990 के दशक में राजस्थान में 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' ने इसकी शुरुआत की थी। उन्होंने मजदूरों की मजदूरी में हो रहे घपले को पकड़ने के लिए सरकारी रिकॉर्ड देखने की मांग की। उनका एक बहुत ही सीधा सा नारा था- "हमारा पैसा, हमारा हिसाब"। सालों की मेहनत और लगातार चले आंदोलनों के बाद, आखिरकार 12 अक्टूबर 2005 को भारत में 'सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005' पूरी तरह से लागू कर दिया गया।

​आरटीआई कैसे लगाते हैं?

यह प्रक्रिया बहुत ही आसान है। आप एक सादे कागज पर अपने सवाल लिखकर या फिर सीधे ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से जन सूचना अधिकारी से जानकारी मांग सकते हैं। इसके लिए बस एक छोटी सी फीस (आमतौर पर 10 रुपये) लगती है और नियम के अनुसार 30 दिन के अंदर उन्हें आपको जवाब देना ही होता है।

​अब आप सोच रहे होंगे कि इसके कानूनी नियम क्या हैं, इसमें कौन-कौन सी धाराएं हैं और विभाग जवाब न दे तो क्या करना चाहिए?

​आपको परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया को गहराई से समझने के लिए मैंने इसी पोस्ट के नीचे एक PDF अटैच कर दिया है। उस पीडीएफ को डाउनलोड करके आप आरटीआई की हर एक धारा, नियम और उसकी पूरी बारीकियों को बड़े आराम से विस्तार में पढ़ सकते हैं।

​नीचे दिए गए लिंक से पीडीएफ डाउनलोड करें और अपने अधिकारों को पहचानें। जागरूक बनिए, सवाल पूछिए!


Right to Information नोट्स का PDF डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें



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